और नहीं मिला आसिफा को इंसाफ
होने दो बच्चियों के साथ
बलात्कार, होने दो बच्चियों की हत्या। क्या फर्क पड़ता है तुम्हें। तुम्हें तो बस
एसी वाले कमरे में बैठकर न्याय करना आता है। लेकिन जिसपर बीतती है न, वही जानता है
कि दर्द क्या होता है साहब। कठुआ में महज 8 साल की आसिफा को अगवा करने के बाद नशे
की हालत में एक मंदिर में कई दिनों तक रखा गया। इस दौरान उस फूल सी मासूम बच्ची के
जिस्म से 5 दरिंदे खेलते रहे। उनमें से कईयों के बच्चे की उम्र उस मासूम से बड़ी
होगी। लेकिन फिर भी किसी को दया नहीं आई। क्या बीतती होगी उस मासूम पर, जब पिता और
दादा के उम्र के लोग उसके जिस्म को नोंच रहे होंगे। नशे की हालत में शायद उसे समझ
भी न आता हो, लेकिन जो दर्द लेकर वो दुनिया से चली गयी, वो शायद ही कभी खत्म हो। ऐसा
दर्द जो हर बच्ची के मन मस्तिष्क पर पड़ा है। ये भारत देश है। एक ऐसा देश, जहां बच्चों
की पीड़ा पर हर वर्ग खड़ा हो उठता है। जहां किसी बच्ची की तकलीफ देख लोग ये नहीं सोचते
कि वो किसी धर्म की होगी। दुख होता है। तकलीफ होती है। और कई सवाल भी खड़े होते
हैं। क्या वाकई हमारा संविधान इतना कमज़ोर है। क्या वाकई न्यायपालिका अब भरोसा
करने लायक नहीं रह गया है। क्या वाकई पुलिस पैसों के आगे बिक गयी है। शर्म आती है
इस व्यवस्था पर। शर्म आती है भारत के संविधान और न्यायपालिका पर। आसिफा के साथ
दरिंदगी करने वालों को तो जीवनदान दे ही दिया, अब तो बस आपलोग अलीगढ़ की ट्विंकल
मामले में दोषियों को बाइज्जत बरी कर दो बस। इसी का इंतज़ार कर रहा देश। उसके बाद
तो फैसला अब भीड़तंत्र करेगा, और मैं भी उस भीड़तंत्र का हिस्सा होना चाहूंगा। फिर
न कोई जज, न कोई पुलिस, न कोई संविधान। बस फैसला ऑन द स्पॉट।
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