बिहार विधानसभा चुनाव मेरी नजर में...
बिहार विधानसभा पांच चरणों में होना है... 12 अक्टूबर
से 5
नवंबर तक मतदान होगा, और परिणाम 8 नवंबर
को आना है... इस बार का चुनाव हर चुनावों से अलग दिख रहा है... एक तरफ मोदी लहर
में एनडीए मांझी की नाव के सहारे सत्ता के गलियारे पहुंचने की कोशिश में लगा है...
वहीं लालटेन की रोशनी में लालू प्रसाद यादव हाथ के सहारे कमल को तीर से भेदने की
जुगत कर रहे हैं... इधर तीसरे मोर्चे की शक्ल ले चुका तीन दल लोगों को घड़ी से समय
की अहमियत बताते हुए साइकिल पर चढ़ स्टंट करते हुए बल्ले से गेंद को मारकर
विधानसभा में पहुंचाना चाह रहे हैं... इधर परिवारवाद न करने की लाख दुहाई दे रहे
हर पार्टी के नेता खुद अपनों को मैदान में उतारकर परिवार की राजनीतिक जमीन मजबूत
करने में लगे हैं... एक-दूसरे पर अमर्यादित टिप्पणी कर नीचा दिखाने का काम जारी
है... टिव्टर के जरिये, फेसबुक के जरिये भी अपनी तारीफ और दूसरे की
बुराई करने में नेता पीछे नहीं हट रहे... आचार संहिता उल्लंघन की तलवार भी चल रही
है... कई नेताओं के पर भी कतरे जा रहे हैं... लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ रहा, बल्कि
कैंचीनुमा ज़ुबान की धार और तेज होती जा रही है... मोदी कहते हैं झारखंड में
बीजेपी सरकार विकास की बयार बहा रही है... ये कैसी बयार है, ये माननीय
मोदी जी या एनडीए नेताओं को ही दिखता होगा... बड़े दिनों बाद लालू अपने पुराने
अंदाज में हैं... लोगों को हंसाकर, डांटकर और चुटकुले सुनाकर अपने पक्ष में
करना चाहते हैं... लेकिन वो दिन लद गये लालू जी... क्योंकि हंसने से पेट भर जाता,
तो आज
भाषण सुनने लोगों की भीड़ इकट्ठा नहीं होती... घरों में, मुहल्ले
में हंसने के कम उपाय थोड़े ही हैं... कभी लालू जी के जंगलराज की दुहाई देकर सीएम बने
नीतीश जी कहते हैं कि जंगलराज की बात बीजेपी किया करती थी... वहीं लालू जी को अब
नीतीश के पेट में दांत दिखाई नहीं देता... रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का
वजूद 2014
के लोकसभा चुनाव के पहले खत्म हो चुका था... एनडीए में
शामिल हुए तो संजीवनी मिली, और आज पार्टी भी जिंदा है और वे खुद भी...
लेकिन अकड़ ऐसी कि बिहार में कोई भी चुनाव बंगला में रहकर पंखे की हवा खाकर ही
जीती जा सकती है... बिहार की जनता ने आजादी के बाद से ही वायदों की राजनीति देखी
है... परिवारवाद को पनपते देखा है... हंसी-ठिठोली के दम पर सरकार बनते बिगड़ते
देखा है... ऐसे में जनता का मूड, यानी बिहार का मूड बदल चुका है... इस
बात से इंकार नहीं किया जा सकता... अब भले ही 8 नवंबर
को परिणाम एनडीए के पक्ष में आये या महागठबंधन के... इतना तो तय है, कि
तब तक बिहार की लोगों की मासूमियत पर सियासती रोटी सेंकने वालों को भी नानी जरूर
याद आ गयी होगी...
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