2019 किसका

2019 किसका


अमूमन राजनीतिक पोस्ट या कमेंट से बचता हूं, लेकिन बीते दिनों कुछ बातें ऐसी हुई कि लिखना ज़रुरी है। भारत, दुनिया के पटल पर बनता एक सशक्त देश। विश्व शक्ति के रुप में उभरता हिन्दुस्तान। इसका एक सबूत कि पहले आतंक के पनाहगार देश पाकिस्तान को प्यार और मोहब्बत से समझाने की कोशिश की, और जब सफल न हुए दो उसे दुनिया के सामने नंगा कर दिया। चीन की भारत सीमा में बार-बार घुसने को भी जवाब दिया गया, हालांकि ये मेरी नज़र में काफी नहीं था। लेकिन ठीक विपरीत इसके भारतीय राजनीति। इसमें कोई संदेह नहीं कि बीते चार वर्षों में भारत ने विश्व पटल पर एक मजबूत पहचान बनायी है। लेकिन भारतीय राजनीति का गिरता स्तर इस बात के संकेत हैं, कि आने वाले समय में राह इतनी आसान नहीं। दरअसल ये वो हमाम है, जहां सभी नंगे हैं, बस कोई कम है तो कोई ज़्यादा। मेरा मानना है, कि हर पार्टी में कुछ ऐसे नेता हैं, जो कम नंगे हैं। उनमें बीजेपी के नरेन्द्र मोदी और मनोहर पर्रिकर भी हैं। ठीक उसी तरह जैसे कांग्रेस में प्रणव मुखर्जी और मनमोहन सिंह। बहरहाल 2014 में चुनाव के पहले तक किसी ने सोचा न था, कि मोदी लहर कुछ ऐसी होगी, बीते 60-65 सालों में ज़्यादातर सत्ता पे काबिज रहने वाली कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा मिलना भी कठिन हो जाएगा। इस लहर ने बिहार में खत्म हो चुकी रालोसपा को ज़िंदा किया, तो वहीं लोजपा को फिर से जीने की वजह दी। वहीं बिहार-झारखंड से जेडीयू, आरजेडी, जेएमएम, कांग्रेस का सूपड़ा ही लगभग साफ कर दिया। तो उत्तरप्रदेश से बसपा और सपा को उखाड़ फेंका। बीते कई वर्षों में देश का समुचित विकास न होना, भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार होना, परिवारवाद को बढ़ावा देना, ये वो कारण थे, जिनकी वजह से कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। सब जानते थे, कि कुर्सी पर ईमानदार मनमोहन सिंह बैठे हैं, लेकिन चाबुक सोनिया, राहुल और अहमद पटेल चला रहे हैं। खैर, नई सरकार बनी, उसकी वजह नरेन्द्र मोदी की छवि या बीजेपी नहीं, बल्कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने का एकमात्र विकल्प रहा। चुनाव के दिनों में बीजेपी ने कई वायदे किये। मसलन रोजगार, महंगाई, किसानों का कर्ज माफ, दुनिया में नई पहचान, सैन्य शक्ति को मजबूत, आर्थिक स्थिती सुदृढ़ करना। लेकिन उन वायदों में कई चुनावी जुमले बनकर रह गये। रोजगार के मामले पर हम अभी तक कांग्रेस सरकार जैसी ही हालत है। किसानों का कर्ज न कांग्रेस माफ कर पायी, और न बीजेपी सरकार। हां, महंगाई पर नियंत्रण कुछ हद तक ज़रुर हुआ है। आटा, चावल, दाल की कीमते 2014 की तुलना में बेहद कम हुई हैं। खाने का सामान के साथ ही मनोरंजन भी सस्ता हुआ। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बेहतासा इजाफा हो रहा है। हालांकि ये 2014 की तुलना में महज कुछ रुपये ही ज़्यादा है। तो आखिर ये हाय तौबा क्यों। सिर्फ इसलिए कि मोदी का विरोध करना है। आश्चर्य तब होता है, जब ट्रांसपोटेशन के महंगा होने के बावजूद सभी चीज़ें सस्ती कैसे। ये सरकार की बेहतर नीतियों में से एक है। यानी भविष्य में कभी जब पेट्रोलियम पदार्थ सस्ते होंगे, तो चीज़ें और सस्ती होनी चाहिए। नोटबंदी का होना मेरी समझ में बिल्कुल सही निर्णय रहा, लेकिन जो तरीके अपनाये गये, वो बेहद खतरनाक और जानलेवा साबित हुए। हालांकि कैशलेश करने के पीछे का उद्देश्य बेहद सही है, क्योंकि इससे टैक्स चोरी की उम्मीद बेहद खत्म हो जाएगी। और यह सकारात्मक सराहनीय कदम है। हालांकि कुछ चोर इसका पुरजोर विरोध ज़रुर कर रहे। अब बात परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियों की। राहुल गांधी या सोनिया को मैं नेता नहीं मानता। ये सभी कांग्रेस के परिवारवाद की बैशाखी पर बने नेता हैं। ठीक उसी तरह जैसे बिहार में लालू के खानदान में चल रहा है। एक अनपढ़ और गंवार तब तक देश का विकास नहीं कर सकता। क्योंकि जो खुद अपना विकास नहीं कर सका, वो राज्य और देश का क्या करेगा। ये हाल हम कम अनपढ़ श्रीमती राबड़ी देवी के शासनकाल में देख चुके हैं, सिर्फ लूट और भ्रष्टाचार का गवाह बना बिहार। लूट और चोरी की ऐसी मिसाल की परत दर परत अब भी खुल ही रही है। लालू जी चारा खा गये, उस चारा की कमाई पर आज भी उनके बच्चे ऐश मौज कर रहे हैं। वरना किसी विधायक या सांसद की एक महीने की इतनी तन्खवाह तो नहीं, जितना उनका एक दिन का खर्च है। बावजूद इसके लालू के जेल जाने को उनकी पार्टी के नेता या यूं कहें, कि तेजस्वी गलत बता रहे, मानों वो जनता की गाड़ी कमाई की चोरी नहीं की, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में जेल भुगत रहे हैं। वैसे इसमें भी कोई संदेह नहीं, कि लालू ने बिहार को एक नई पहचान दिलायी। राजनीति में राज्य का कद बढ़ाया। लालू वो नेता बनकर उभरे, जिन्होंने ब्यूरोक्रेट्स को उनकी औकात में रहने को विवश किया। डीएम हो या एसपी, आरजेडी का छोटा से छोटा नेता उनसे गाली-गलौज करने से परहेज नहीं करते। शायद इसीलिए उस राज को जंगलराज, भ्रष्टाचार राज या गुंडाराज कहें तो भी गलत न होगा। हालांकि लालू जी का एक पिता के रुप में बहुत कायल हूं। उन्होंने वहीं किया जो हर पिता चाहता है। मसलन उनके बच्चे बेहतर ज़िंदगी जिये, रुपये-पैसे की कोई कमी उन्हें न हो। शायद इसीलिए भ्रष्टाचार और चोरी की। इसकी सज़ा वो खुद भुगत रहे, लेकिन उनके परिवार वाले आज भी ऐश मौज की ज़िंदगी जी रहे हैं। अब आते हैं 2019 के विकल्प पर। एक ओर मोदी और दूसरी तरफ समूचा विपक्ष। विपक्ष भी ऐसे-ऐसे जिनके दामन पर सिर्फ चोरी, घोटालों और भ्रष्टाचार की छींट है। सभी के सभी आरोपी, कुछ दोषी और कुछ सजायाफ्ता। जिनकी न नीतियां आपस में कभी मिलीं, न दिल मिले, न एक-दूसरे से गाली-गलौज से कभी परहेज किया। लेकिन अब हाथ भी मिल रहे, दिल भी मिल रहे, गलबहियां भी हो रही। आखिर क्यों। सिर्फ एक मोदी को हराने के लिए। एक शख्स से इतना डर। ऐसा लगने लगा है कि सचमुच इस मोदी नामक बंदे में कुछ तो दम है, जो विपरीत धारा वाले भी आपस में मिल गये। और इनका समर्थन करने वालों में सिर्फ कुछ खास जातियां, खास कौम या खास लोग नहीं, बल्कि एक खतरनाक एजेंडे पर काम कर रहे लोग और उनसे प्रभावित लोग हैं। अब सवाल यह कि मोदी जी ने अपने वायदों में आधे से अधिक को अभी पूरा नहीं किया, और वो अपनी तक सिर्फ चुनावी जुमले साबित हुए हैं। ऐसे में क्या एक बार मोदी को देश की बागडोर दी जा सकती है। लेकिन जब सोचता हूं, कि आखिर उनका विकल्प है कौन। और जैसे ही नज़र जाती है राहुल, मायावती, लालू, केजरीवाल, कुमारस्वामी और ममता बनर्जी जैसे चोरों और भ्रष्टाचारियों पर, तो दिल मोदी को इन सबसे कहीं ज़्यादा बेहतर ही नहीं, बहुत बेहतर नेता मानता है। अगर मेरे वश में होता तो देश में ही प्रेसिडेंट रुल लगाने की वकालत करता, या फिर सेना के हवाले ही देश को करने के लिए वोट देता। लेकिन संविधान की ऐसी मजबूरी कि हम ऐसा नहीं कर सकते। ऐसे में सब नंगों में से कम नंगा बेहतर है। मोदी इन सबमें बेहतर हैं। लेकिन उनके कई सिपाहसलार बहुत गड़बड़। अगर समय रहते उन मंत्रियों, विधायकों और सांसदों को चेताया नहीं गया, तो थोड़ी मुश्किल ज़रुर होगी, लेकिन मेरा मानना है, कि 2019 मोदी का ही है और अगले पांच सालों तक तो उन्हीं का रहना चाहिए। हालांकि राजनीतिक परिदृश्य इस बार की तुलना में कुछ अलग ज़रुर हो सकते हैं। मसलन बीजेपी पूर्ण बहुमत में होगी या नहीं। त्रिशंकु सरकार बनेगी क्या। या ऐसी ही कुछ संभावनाएं ज़िंदा हैं। क्योंकि इसमें भी कोई शक नहीं कि बीजेपी की 2014 में शानदार जीत और ज़्यादातर राज्यों में सरकार बना लेने के बाद उसके भीतर जो दंभ भर गया है, वो उसे मुश्किलों में डालेगा। आम जनता से संवाद कम हुए हैं, घटक दलों के बीच संवादहीनता भी सियासी गठजोड़ या तोड़फोड़ में अहम भूमिका निभा सकता है।

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